वह दुष्ट बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंके आश्रमोंकी सुन्दर-सुन्दर लता-वनस्पतियोंको तोड़-मरोड़कर चौपट कर देता और उनके यज्ञसम्बन्धी अग्नि-कुण्डोंमें मलमूत्र डालकर अग्नियोंको दूषित कर देता॥ ६॥
आश्रमानृषिमुख्यानां कृत्वा भग्नवनस्पतीन्।
अदूषयच्छकृन्मूत्रैरग्नीन् वैतानिकान् खलः॥ ६
वह दुष्ट बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंके आश्रमोंकी सुन्दर-सुन्दर लता-वनस्पतियोंको तोड़-मरोड़कर चौपट कर देता और उनके यज्ञसम्बन्धी अग्नि-कुण्डोंमें मलमूत्र डालकर अग्नियोंको दूषित कर देता॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.67.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 551) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/67/6/