श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.67.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 67 · अथ सप्तषष्टितमोऽध्यायः

सख्युः सोऽपचितिं कुर्वन् वानरो राष्ट्रविप्लवम्।

पुरग्रामाकरान् घोषानदहद् वह्निमुत्सृजन्॥ ३

sakhyuḥ so'pacitiṃ kurvan vānaro rāṣṭraviplavam|

puragrāmākarān ghoṣānadahad vahnimutsṛjan|| 3

अर्थ

जब उसने सुना कि श्रीकृष्णने भौमासुरको मार डाला, तब वह अपने मित्रकी मित्रताके ऋणसे उऋण होनेके लिये राष्ट्र-विप्लव करनेपर उतारू हो गया। वह वानर बड़े-बड़े नगरों, गाँवों, खानों और अहीरोंकी बस्तियोंमें आग लगाकर उन्हें जलाने लगा॥ ३॥

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