श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.67.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 67 · अथ सप्तषष्टितमोऽध्यायः

यादवेन्द्रोऽपि तं दोर्भ्यां त्यक्त्वा मुसललांगले।

जत्रावभ्यर्दयत्क्रुद्धः सोऽपतद् रुधिरं वमन्॥ २५

yādavendro'pi taṃ dorbhyāṃ tyaktvā musalalāṃgale|

jatrāvabhyardayatkruddhaḥ so'patad rudhiraṃ vaman|| 25

अर्थ

अब यदुवंश-शिरोमणि बलरामजीने हल और मूसल अलग रख दिये तथा क्रुद्ध होकर दोनों हाथोंसे उसके जत्रुस्थान (हँसली) पर प्रहार किया। इससे वह वानर खून उगलता हुआ धरतीपर गिर पड़ा॥ २५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें