अब यदुवंश-शिरोमणि बलरामजीने हल और मूसल अलग रख दिये तथा क्रुद्ध होकर दोनों हाथोंसे उसके जत्रुस्थान (हँसली) पर प्रहार किया। इससे वह वानर खून उगलता हुआ धरतीपर गिर पड़ा॥ २५॥
यादवेन्द्रोऽपि तं दोर्भ्यां त्यक्त्वा मुसललांगले।
जत्रावभ्यर्दयत्क्रुद्धः सोऽपतद् रुधिरं वमन्॥ २५
अब यदुवंश-शिरोमणि बलरामजीने हल और मूसल अलग रख दिये तथा क्रुद्ध होकर दोनों हाथोंसे उसके जत्रुस्थान (हँसली) पर प्रहार किया। इससे वह वानर खून उगलता हुआ धरतीपर गिर पड़ा॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.67.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 553) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/67/25/