अन्तमें कपिराज द्विविद अपनी ताड़के समान लम्बी बाँहोंसे घूँसा बाँधकर बलरामजीकी ओर झपटा और पास जाकर उसने उनकी छातीपर प्रहार किया॥ २४॥
स बाहू तालसंकाशौ मुष्टीकृत्य कपीश्वरः।
आसाद्य रोहिणीपुत्रं ताभ्यां वक्षस्यरूरुजत्॥ २४
अन्तमें कपिराज द्विविद अपनी ताड़के समान लम्बी बाँहोंसे घूँसा बाँधकर बलरामजीकी ओर झपटा और पास जाकर उसने उनकी छातीपर प्रहार किया॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.67.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 553) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/67/24/