श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.11.47

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिङ्गैर्ऋषयः संस्तुवन्त्यमुम्।✎ 1247 1248

गन्धर्वास्तं प्रगायन्ति नृत्यन्त्यप्सरसोऽग्रतः॥ ४७

sāmargyajurbhistalliṅgair:ṛṣayaḥ saṃstuvantyamum|

gandharvāstaṃ pragāyanti nṛtyantyapsaraso'grataḥ|| 47

अर्थ

सूर्यभगवान्‌के गणोंमें ऋषिलोग तो सूर्यसम्बन्धी ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते हैं और गंधर्व उनके सुयशका गान करते रहते हैं। अप्सराएँ आगे-आगे नृत्य करती चलती हैं॥ ४७॥✎ 1861

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1247 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिङ्गैऋर्षय: → सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिङ्गैऋर्ऋषयः
  • #1248 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिङ्गैऋर्ऋषय: → सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिङ्गैर्ऋषयः
  • #1861 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ४ ७॥ → ४७॥

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