॥ श्रीहरिः ॥
द्वादश स्कन्ध
श्रीमद्भागवतमहापुराणम्
द्वादशः स्कन्धः
- 1अथ प्रथमोऽध्यायःकलियुगके राजवंशोंका वर्णन43 श्लोक
पृष्ठ 907 - 2अथ द्वितीयोऽध्यायःकलियुगके धर्म44 श्लोक
पृष्ठ 911 - 3अथ तृतीयोऽध्यायःराज्य, युगधर्म और कलियुगके दोषोंसे बचनेका उपाय—नामसंकीर्तन52 श्लोक
पृष्ठ 916 - 4अथ चतुर्थोऽध्यायःचार प्रकारके प्रलय43 श्लोक
पृष्ठ 924 - 5अथ पञ्चमोऽध्यायःश्रीशुकदेवजीका अन्तिम उपदेश13 श्लोक
पृष्ठ 930 - 6अथ षष्ठोऽध्यायःपरीक्षित्की परमगति, जनमेजयका सर्पसत्र और वेदोंके शाखाभेद80 श्लोक
पृष्ठ 932 - 7अथ सप्तमोऽध्यायःअथर्ववेदकी शाखाएँ और पुराणोंके लक्षण25 श्लोक
पृष्ठ 942 - 8अथाष्टमोऽध्यायःमार्कण्डेयजीकी तपस्या और वर-प्राप्ति49 श्लोक
पृष्ठ 946 - 9अथ नवमोऽध्यायःमार्कण्डेयजीका माया-दर्शन34 श्लोक
पृष्ठ 953 - 10अथ दशमोऽध्यायःमार्कण्डेयजीको भगवान् शंकरका वरदान42 श्लोक
पृष्ठ 958 - 11अथैकादशोऽध्यायःभगवान्के अंग, उपांग और आयुधोंका रहस्य तथा विभिन्न सूर्यगणोंका वर्णन50 श्लोक
पृष्ठ 963 - 12अथ द्वादशोऽध्यायःश्रीमद्भागवतकी संक्षिप्त विषय-सूची68 श्लोक
पृष्ठ 970 - 13अथ त्रयोदशोऽध्यायःविभिन्न पुराणोंकी श्लोक-संख्या और श्रीमद्भागवतकी महिमा23 श्लोक
पृष्ठ 979
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥