श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.11.48

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

उन्‍नह्यन्ति रथं नागा ग्रामण्यो रथयोजकाः।

चोदयन्ति रथं पृष्ठे नैर्ऋता बलशालिनः॥ ४८✎ 1249 1250

unnahyanti rathaṃ nāgā grāmaṇyo rathayojakāḥ|

codayanti rathaṃ pṛṣṭhe nair:ṛtā balaśālinaḥ|| 48

अर्थ

नागगण रस्सीकी तरह उनके रथको कसे रहते हैं। यक्षगण रथका साज सजाते हैं और बलवान् राक्षस उसे पीछेसे ढकेलते हैं॥ ४८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1249 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्ता → नैऋर्ऋता
  • #1250 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्ऋता → नैर्ऋता

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