श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.11.46

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

द्वादशस्वपि मासेषु देवोऽसौ षड्भिरस्य वै।

चरन् समन्तात्तनुते परत्रेह च सन्मतिम्॥ ४६

dvādaśasvapi māseṣu devo'sau ṣaḍbhirasya vai|

caran samantāttanute paratreha ca sanmatim|| 46

अर्थ

ये सूर्यदेव अपने छः गणोंके साथ बारहों महीने सर्वत्र विचरते रहते हैं और इस लोक तथा परलोकमें विवेक-बुद्धिका विस्तार करते हैं॥ ४६॥✎ 1861

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1861 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ४ ७॥ → ४७॥

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