श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

शमो दमस्तितिक्षेक्षा तपः सत्यं दया स्मृतिः।

तुष्टिस्त्यागोऽस्पृहा श्रद्धा ह्रीर्दयादिः स्वनिर्वृतिः॥ २✎ 1230

śamo damastitikṣekṣā tapaḥ satyaṃ dayā smṛtiḥ|

tuṣṭistyāgo'spṛhā śraddhā hrīrdayādiḥ svanirvṛtiḥ|| 2

अर्थ

सत्त्वगुणकी वृत्तियाँ हैं—शम (मनःसंयम), दम (इन्द्रियनिग्रह), तितिक्षा (सहिष्णुता), विवेक, तप, सत्य, दया, स्मृति, सन्तोष, त्याग, विषयोंके प्रति अनिच्छा, श्रद्धा, लज्जा (पाप करनेमें स्वाभाविक संकोच), आत्मरति, दान, विनय और सरलता आदि॥ २॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1230 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृर्दयादि: → ह्रीर्दयादिः

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