श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.1

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका निरूपण

श्रीभगवानुवाच

गुणानामसमिश्राणां पुमान् येन यथा भवेत्।

तन्मे पुरुषवर्येदमुपधारय शंसतः॥ १

guṇānāmasamiśrāṇāṃ pumān yena yathā bhavet|

tanme puruṣavaryedamupadhāraya śaṃsataḥ|| 1

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—पुरुषप्रवर उद्धवजी! प्रत्येक व्यक्तिमें अलग-अलग गुणोंका प्रकाश होता है। उनके कारण प्राणियोंके स्वभावमें भी भेद हो जाता है। अब मैं बतलाता हूँ कि किस गुणसे कैसा-कैसा स्वभाव बनता है। तुम सावधानीसे सुनो॥ १॥

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