वसुदेवजीने कहा—भाईजी! भगवान्ने मनुष्योंके लिये एक बहुत बड़ा बन्धन बना दिया है। उस बन्धनका नाम है स्नेह, प्रेमपाश। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि बड़े-बड़े शूरवीर और योगी-यति भी उसे तोड़नेमें असमर्थ हैं॥ ६१॥
भ्रातरीशकृतः पाशो नृणां यः स्नेहसंज्ञितः।
तं दुस्त्यजमहं मन्ये शूराणामपि योगिनाम्॥ ६१
वसुदेवजीने कहा—भाईजी! भगवान्ने मनुष्योंके लिये एक बहुत बड़ा बन्धन बना दिया है। उस बन्धनका नाम है स्नेह, प्रेमपाश। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि बड़े-बड़े शूरवीर और योगी-यति भी उसे तोड़नेमें असमर्थ हैं॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 650) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/84/61/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1201 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां