॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.84.62
अस्मास्वप्रतिकल्पेयं यत् कृताज्ञेषु सत्तमैः।
मैत्र्यर्पिताफला वापि न निवर्तेत कर्हिचित्॥ ६२✎ 2137
asmāsvapratikalpeyaṃ yat kṛtājñeṣu sattamaiḥ|
maitryarpitāphalā vāpi na nivarteta karhicit|| 62
अर्थ
आपने हम अकृतज्ञोंके प्रति अनुपम मित्रताका व्यवहार किया है। क्यों न हो, आप-सरीखे संत शिरोमणियोंका तो ऐसा स्वभाव ही होता है। हम इसका कभी बदला नहीं चुका सकते, आपको इसका कोई फल नहीं दे सकते। फिर भी हमारा यह मैत्री-सम्बन्ध कभी टूटनेवाला नहीं है। आप इसको सदा निभाते रहेंगे॥ ६२॥