श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.63

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

प्रागकल्पाच्च कुशलं भ्रातर्वो नाचराम हि।

अधुना श्रीमदान्धाक्षा न पश्यामः पुरः सतः॥ ६३

prāgakalpācca kuśalaṃ bhrātarvo nācarāma hi|

adhunā śrīmadāndhākṣā na paśyāmaḥ puraḥ sataḥ|| 63

अर्थ

भाईजी! पहले तो बंदीगृहमें बंद होनेके कारण हम आपका कुछ भी प्रिय और हित न कर सके। अब हमारी यह दशा हो रही है कि हम धन-सम्पत्तिके नशेसे—श्रीमदसे अंधे हो रहे हैं; आप हमारे सामने हैं तो भी हम आपकी ओर नहीं देख पाते॥ ६३॥

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