श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.64

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

मा राज्यश्रीरभूत् पुंसः श्रेयस्कामस्य मानद।

स्वजनानुत बन्धून् वा न पश्यति ययान्धदृक्॥ ६४

mā rājyaśrīrabhūt puṃsaḥ śreyaskāmasya mānada|

svajanānuta bandhūn vā na paśyati yayāndhadṛk|| 64

अर्थ

दूसरोंको सम्मान देकर स्वयं सम्मान न चाहनेवाले भाईजी! जो कल्याणकामी है उसे राज्यलक्ष्मी न मिले—इसीमें उसका भला है; क्योंकि मनुष्य राज्यलक्ष्मीसे अंधा हो जाता है और अपने भाई-बन्धु, स्वजनोंतकको नहीं देख पाता॥ ६४॥

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