श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.60

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

वसुदेवोऽञ्जसोत्तीर्य मनोरथमहार्णवम्।

सुहृद‍्वृतः प्रीतमना नन्दमाह करे स्पृशन्॥ ६०

vasudevo'ñjasottīrya manorathamahārṇavam|

suhṛdvṛtaḥ prītamanā nandamāha kare spṛśan|| 60

अर्थ

वसुदेवजी अनायास ही अपने बहुत बड़े मनोरथका महासागर पार कर गये थे। उनके आनन्दकी सीमा न थी। सभी आत्मीय स्वजन उनके साथ थे। उन्होंने नन्दबाबाका हाथ पकड़कर कहा॥ ६०॥✎ 1441 1442

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1441 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमें—रामहृदमें → हृदमें—रामह्रदमें
  • #1442 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमें—रामह्रदमें → ह्रदमें—रामह्रदमें

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