लक्ष्मणाने कहा—रानीजी! देवर्षि नारद बार-बार भगवान्के अवतार और लीलाओंका गान करते रहते थे। उसे सुनकर और यह सोचकर कि लक्ष्मीजीने समस्त लोकपालोंका त्याग करके भगवान्का ही वरण किया, मेरा चित्त भगवान्के चरणोंमें आसक्त हो गया॥ १७॥
ममापि राज्ञ्यच्युतजन्मकर्म
श्रुत्वा मुहुर्नारदगीतमास ह।
चित्तं मुकुन्दे किल पद्महस्तया
वृतः सुसंमृश्य विहाय लोकपान्॥ १७
लक्ष्मणाने कहा—रानीजी! देवर्षि नारद बार-बार भगवान्के अवतार और लीलाओंका गान करते रहते थे। उसे सुनकर और यह सोचकर कि लक्ष्मीजीने समस्त लोकपालोंका त्याग करके भगवान्का ही वरण किया, मेरा चित्त भगवान्के चरणोंमें आसक्त हो गया॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.83.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 639) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/83/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)