श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

अस्य मे पादसंस्पर्शो भवेज्जन्मनि जन्मनि।

कर्मभिर्भ्राम्यमाणाया येन तच्छ्रेय आत्मनः॥ १६

asya me pādasaṃsparśo bhavejjanmani janmani|

karmabhirbhrāmyamāṇāyā yena tacchreya ātmanaḥ|| 16

अर्थ

मैं अपना परम कल्याण इसीमें समझती हूँ कि कर्मके अनुसार मुझे जहाँ-जहाँ जन्म लेना पड़े, सर्वत्र इन्हींके चरणकमलोंका संस्पर्श प्राप्त होता रहे॥ १६॥

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