मैं अपना परम कल्याण इसीमें समझती हूँ कि कर्मके अनुसार मुझे जहाँ-जहाँ जन्म लेना पड़े, सर्वत्र इन्हींके चरणकमलोंका संस्पर्श प्राप्त होता रहे॥ १६॥
अस्य मे पादसंस्पर्शो भवेज्जन्मनि जन्मनि।
कर्मभिर्भ्राम्यमाणाया येन तच्छ्रेय आत्मनः॥ १६
मैं अपना परम कल्याण इसीमें समझती हूँ कि कर्मके अनुसार मुझे जहाँ-जहाँ जन्म लेना पड़े, सर्वत्र इन्हींके चरणकमलोंका संस्पर्श प्राप्त होता रहे॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.83.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 639) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/83/16/