श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

भद्रोवाच

पिता मे मातुलेयाय स्वयमाहूय दत्तवान्।

कृष्णे कृष्णाय तच्चित्तामक्षौहिण्या सखीजनैः॥ १५

pitā me mātuleyāya svayamāhūya dattavān|

kṛṣṇe kṛṣṇāya taccittāmakṣauhiṇyā sakhījanaiḥ|| 15

अर्थ

भद्राने कहा—द्रौपदीजी! भगवान् मेरे मामाके पुत्र हैं। मेरा चित्त इन्हींके चरणोंमें अनुरक्त हो गया था। जब मेरे पिताजीको यह बात मालूम हुई, तब उन्होंने स्वयं ही भगवान्‌को बुलाकर अक्षौहिणी सेना और बहुत-सी दासियोंके साथ मुझे इन्हींके चरणोंमें समर्पित कर दिया॥ १५॥ मैं अपना परम कल्याण इसीमें समझती हूँ कि कर्मके अनुसार मुझे जहाँ-जहाँ जन्म लेना पड़े, सर्वत्र इन्हींके चरणकमलोंका संस्पर्श प्राप्त होता रहे॥ १६॥

यह व्याख्या श्लोक 10.83.15 से 10.83.16 तककी एक साथ है।

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