इस प्रकार भगवान् बल-पौरुषके द्वारा मुझे प्राप्त कर चतुरंगिणी सेना और दासियोंके साथ द्वारका ले आये। मार्गमें जिन क्षत्रियोंने विघ्न डाला, उन्हें जीत भी लिया। मेरी यही अभिलाषा है कि मुझे इनकी सेवाका अवसर सदा-सर्वदा प्राप्त होता रहे॥ १४॥
य इत्थं वीर्यशुक्लां मां दासीभिश्चतुरंगिणीम्।
पथि निर्जित्य राजन्यान् निन्ये तद्दास्यमस्तु मे॥ १४
इस प्रकार भगवान् बल-पौरुषके द्वारा मुझे प्राप्त कर चतुरंगिणी सेना और दासियोंके साथ द्वारका ले आये। मार्गमें जिन क्षत्रियोंने विघ्न डाला, उन्हें जीत भी लिया। मेरी यही अभिलाषा है कि मुझे इनकी सेवाका अवसर सदा-सर्वदा प्राप्त होता रहे॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.83.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 639) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/83/14/