श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

ज्ञात्वा मम मतं साध्वि पिता दुहितृवत्सलः।

बृहत्सेन इति ख्यातस्तत्रोपायमचीकरत्॥ १८

jñātvā mama mataṃ sādhvi pitā duhitṛvatsalaḥ|

bṛhatsena iti khyātastatropāyamacīkarat|| 18

अर्थ

साध्वी! मेरे पिता बृहत्सेन मुझपर बहुत प्रेम रखते थे। जब उन्हें मेरा अभिप्राय मालूम हुआ, तब उन्होंने मेरी इच्छाकी पूर्तिके लिये यह उपाय किया॥ १८॥✎ 1716

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1716 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्वयंवर-सभामें → स्वयंवरसभामें

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