साध्वी! मेरे पिता बृहत्सेन मुझपर बहुत प्रेम रखते थे। जब उन्हें मेरा अभिप्राय मालूम हुआ, तब उन्होंने मेरी इच्छाकी पूर्तिके लिये यह उपाय किया॥ १८॥✎ 1716
ज्ञात्वा मम मतं साध्वि पिता दुहितृवत्सलः।
बृहत्सेन इति ख्यातस्तत्रोपायमचीकरत्॥ १८
साध्वी! मेरे पिता बृहत्सेन मुझपर बहुत प्रेम रखते थे। जब उन्हें मेरा अभिप्राय मालूम हुआ, तब उन्होंने मेरी इच्छाकी पूर्तिके लिये यह उपाय किया॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.83.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 640) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/83/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)