श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

यथा स्वयंवरे राज्ञि मत्स्यः पार्थेप्सया कृतः।

अयं तु बहिराच्छन्‍नो दृश्यते स जले परम्॥ १९

yathā svayaṃvare rājñi matsyaḥ pārthepsayā kṛtaḥ|

ayaṃ tu bahirācchanno dṛśyate sa jale param|| 19

अर्थ

महारानी! जिस प्रकार पाण्डववीर अर्जुनकी प्राप्तिके लिये आपके पिताने स्वयंवरमें मत्स्यवेधका आयोजन किया था, उसी प्रकार मेरे पिताने भी किया। आपके स्वयंवरकी अपेक्षा हमारे यहाँ यह विशेषता थी कि मत्स्य बाहरसे ढका हुआ था, केवल जलमें ही उसकी परछाईं दीख पड़ती थी॥ १९॥✎ 1716

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1716 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्वयंवर-सभामें → स्वयंवरसभामें

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