श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

निःक्षत्रियां महीं कुर्वन् रामः शस्त्रभृतां वरः।

नृपाणां रुधिरौघेण यत्र चक्रे महाह्रदान्॥ ३✎ 1192

niḥkṣatriyāṃ mahīṃ kurvan rāmaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ|

nṛpāṇāṃ rudhiraugheṇa yatra cakre mahāhradān|| 3

अर्थ

समन्तपंचक क्षेत्र वह है, जहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने सारी पृथ्वीको क्षत्रियहीन करके राजाओंकी रुधिरधारासे पाँच बड़े-बड़े कुण्ड बना दिये थे॥ ३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1192 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महाहृदान्॥ → महाह्रदान्॥

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