श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

ईजे च भगवान् रामो यत्रास्पृष्टोऽपि कर्मणा।

लोकस्य ग्राहयन्‍नीशो यथान्योऽघापनुत्तये॥ ४

īje ca bhagavān rāmo yatrāspṛṣṭo'pi karmaṇā|

lokasya grāhayannīśo yathānyo'ghāpanuttaye|| 4

अर्थ

जैसे कोई साधारण मनुष्य अपने पापकी निवृत्तिके लिये प्रायश्‍चित्त करता है, वैसे ही सर्वशक्तिमान् भगवान् परशुरामने अपने साथ कर्मका कुछ सम्बन्ध न होनेपर भी लोकमर्यादाकी रक्षाके लिये वहींपर यज्ञ किया था॥ ४॥

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