श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

तं ज्ञात्वा मनुजा राजन् पुरस्तादेव सर्वतः।

समन्तपंचकं क्षेत्रं ययुः श्रेयोविधित्सया॥ २

taṃ jñātvā manujā rājan purastādeva sarvataḥ|

samantapaṃcakaṃ kṣetraṃ yayuḥ śreyovidhitsayā|| 2

अर्थ

परीक्षित्! मनुष्योंको ज्योतिषियोंके द्वारा उस ग्रहणका पता पहलेसे ही चल गया था, इसलिये सब लोग अपने-अपने कल्याणके उद्देश्यसे पुण्य आदि उपार्जन करनेके लिये समन्तपंचक-तीर्थ कुरुक्षेत्रमें आये॥ २॥

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