परीक्षित्! मनुष्योंको ज्योतिषियोंके द्वारा उस ग्रहणका पता पहलेसे ही चल गया था, इसलिये सब लोग अपने-अपने कल्याणके उद्देश्यसे पुण्य आदि उपार्जन करनेके लिये समन्तपंचक-तीर्थ कुरुक्षेत्रमें आये॥ २॥
तं ज्ञात्वा मनुजा राजन् पुरस्तादेव सर्वतः।
समन्तपंचकं क्षेत्रं ययुः श्रेयोविधित्सया॥ २
परीक्षित्! मनुष्योंको ज्योतिषियोंके द्वारा उस ग्रहणका पता पहलेसे ही चल गया था, इसलिये सब लोग अपने-अपने कल्याणके उद्देश्यसे पुण्य आदि उपार्जन करनेके लिये समन्तपंचक-तीर्थ कुरुक्षेत्रमें आये॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.82.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 630) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/2/