श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

युधिष्ठिर उवाच

ये स्युस्त्रैलोक्यगुरवः सर्वे लोकमहेश्‍वराः।

वहन्ति दुर्लभं लब्ध्वा शिरसैवानुशासनम्॥ २

ye syustrailokyaguravaḥ sarve lokamaheśvarāḥ|

vahanti durlabhaṃ labdhvā śirasaivānuśāsanam|| 2

अर्थ

धर्मराज युधिष्ठिरने कहा—सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! त्रिलोकीके स्वामी ब्रह्मा, शंकर आदि और इन्द्रादि लोकपाल—सब आपकी आज्ञा पानेके लिये तरसते रहते हैं और यदि वह मिल जाती है तो बड़ी श्रद्धासे उसको शिरोधार्य करते हैं॥ २॥✎ 1439

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1439 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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