श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

स भवानरविन्दाक्षो दीनानामीशमानिनाम्।

धत्तेऽनुशासनं भूमंस्तदत्यन्तविडम्बनम्॥ ३

sa bhavānaravindākṣo dīnānāmīśamāninām|

dhatte'nuśāsanaṃ bhūmaṃstadatyantaviḍambanam|| 3

अर्थ

अनन्त! हमलोग हैं तो अत्यन्त दीन, परन्तु मानते हैं अपनेको भूपति और नरपति। ऐसी स्थितिमें हैं तो हम दण्डके पात्र, परन्तु आप हमारी आज्ञा स्वीकार करते हैं और उसका पालन करते हैं। सर्वशक्तिमान् कमलनयन भगवान्‌के लिये यह मनुष्य-लीलाका अभिनयमात्र है॥ ३॥✎ 1439

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1439 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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