श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.2.28

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सूत उवाच

इति श्रुत्वा प्रसन्‍नास्ताः कालिन्दीमभिवन्द्य तत्।

कथयामासुरागत्य वज्रं प्रति परीक्षितम्॥ २८

iti śrutvā prasannāstāḥ kālindīmabhivandya tat|

kathayāmāsurāgatya vajraṃ prati parīkṣitam|| 28

अर्थ

सूतजी कहते हैं—यमुनाजीकी बतायी हुई बातें सुनकर श्रीकृष्णकी रानियाँ बहुत प्रसन्‍न हुईं। उन्होंने यमुनाजीको प्रणाम किया और वहाँसे लौटकर वज्रनाभ तथा परीक्षित‍्से वे सारी बातें कह सुनायीं॥ २८॥✎ 1460 1461

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1460 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पराक्षित‍्को → परीक्षित‍्को
  • #1461 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: लौट-कर → लौटकर

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