॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.12.10
नाहं परायुर्ऋषयो न मरीचिमुख्या ✎ 1114 1115
जानन्ति यद्विरचितं खलु सत्त्वसर्गाः।
यन्मायया मुषितचेतस ईश दैत्य-
मर्त्यादयः किमुत शश्वदभद्रवृत्ताः॥ १०
nāhaṃ parāyur:ṛṣayo na marīcimukhyā
jānanti yadviracitaṃ khalu sattvasargāḥ|
yanmāyayā muṣitacetasa īśa daitya-
martyādayaḥ kimuta śaśvadabhadravṛttāḥ|| 10
अर्थ
प्रभो! मैं, ब्रह्मा और मरीचि आदि ऋषि—जो सत्त्वगुणकी सृष्टिके अन्तर्गत हैं—जब आपकी बनायी हुई सृष्टिका भी रहस्य नहीं जान पाते, तब आपको तो जान ही कैसे सकते हैं। फिर जिनका चित्त मायाने अपने वशमें कर रखा है और जो सर्वदा रजोगुणी और तमोगुणी कर्मोंमें लगे रहते हैं, वे असुर और मनुष्य आदि तो भला जानेंगे ही क्या॥ १०॥