श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.9

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

त्वां ब्रह्म केचिदवयन्त्युत धर्ममेके

एके परं सदसतोः पुरुषं परेशम्।

अन्येऽवयन्ति नवशक्तियुतं परं त्वां

केचिन्महापुरुषमव्ययमात्मतन्त्रम्॥ ९

tvāṃ brahma kecidavayantyuta dharmameke

eke paraṃ sadasatoḥ puruṣaṃ pareśam|

anye'vayanti navaśaktiyutaṃ paraṃ tvāṃ

kecinmahāpuruṣamavyayamātmatantram|| 9

अर्थ

प्रभो! कोई-कोई आपको ब्रह्म समझते हैं, तो दूसरे आपको धर्म कहकर वर्णन करते हैं। इसी प्रकार कोई आपको प्रकृति और पुरुषसे परे परमेश्‍वर मानते हैं तो कोई विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना और अनुग्रहा—इन नौ शक्तियोंसे युक्त परम पुरुष तथा दूसरे क्लेश-कर्म आदिके बन्धनसे रहित, पूर्वजोंके भी पूर्वज, अविनाशी पुरुषविशेषके रूपमें मानते हैं॥ ९॥

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