श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.11

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

स त्वं समीहितमदः स्थितिजन्मनाशं

भूतेहितं च जगतो भवबन्धमोक्षौ।

वायुर्यथा विशति खं च चराचराख्यं

सर्वं तदात्मकतयावगमोऽवरुन्त्से॥ ११

sa tvaṃ samīhitamadaḥ sthitijanmanāśaṃ

bhūtehitaṃ ca jagato bhavabandhamokṣau|

vāyuryathā viśati khaṃ ca carācarākhyaṃ

sarvaṃ tadātmakatayāvagamo'varuntse|| 11

अर्थ

प्रभो! आप सर्वात्मक एवं ज्ञानस्वरूप हैं। इसीलिये वायुके समान आकाशमें अदृश्य रहकर भी आप सम्पूर्ण चराचर जगत‍्में सदा-सर्वदा विद्यमान रहते हैं तथा इसकी चेष्टा, स्थिति, जन्म, नाश, प्राणियोंके कर्म एवं संसारके बन्धन, मोक्ष—सभीको जानते हैं॥ ११॥

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