ऋषियोंने कहा—पुरुषोत्तम! आपने तपस्याके द्वारा ही अपनेमें लीन हुए जगत्की फिरसे रचना की थी और कृपा करके उसी आत्मतेजःस्वरूप श्रेष्ठ तपस्याका उपदेश आपने हमारे लिये भी किया था। इस दैत्यने उसी तपस्याका उच्छेद कर दिया था। शरणागतवत्सल! उस तपस्याकी रक्षाके लिये अवतार ग्रहण करके आपने हमारे लिये फिरसे उसी उपदेशका अनुमोदन किया है॥ ४३॥
त्वं नस्तपः परममात्थ यदात्मतेजो
येनेदमादिपुरुषात्मगतं ससर्ज।
तद् विप्रलुप्तममुनाद्य शरण्यपाल
रक्षागृहीतवपुषा पुनरन्वमंस्थाः॥ ४३
ऋषियोंने कहा—पुरुषोत्तम! आपने तपस्याके द्वारा ही अपनेमें लीन हुए जगत्की फिरसे रचना की थी और कृपा करके उसी आत्मतेजःस्वरूप श्रेष्ठ तपस्याका उपदेश आपने हमारे लिये भी किया था। इस दैत्यने उसी तपस्याका उच्छेद कर दिया था। शरणागतवत्सल! उस तपस्याकी रक्षाके लिये अवतार ग्रहण करके आपने हमारे लिये फिरसे उसी उपदेशका अनुमोदन किया है॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.8.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 854) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/8/43/