श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.44

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

पितर ऊचुः

श्राद्धानि नोऽधिबुभुजे प्रसभं तनूजै-

र्दत्तानि तीर्थसमयेऽप्यपिबत् तिलाम्बु१।

तस्योदरान्‍नखविदीर्णवपाद् य आर्च्छत्

तस्मै नमो नृहरयेऽखिलधर्मगोप्त्रे॥ ४४

śrāddhāni no'dhibubhuje prasabhaṃ tanūjai-

rdattāni tīrthasamaye'pyapibat tilāmbu|

tasyodarānnakhavidīrṇavapād ya ārcchat

tasmai namo nṛharaye'khiladharmagoptre|| 44

अर्थ

पितरोंने कहा—प्रभो! हमारे पुत्र हमारे लिये पिण्डदान करते थे, यह उन्हें बलात् छीनकर खा जाया करता था। जब वे पवित्र तीर्थमें या संक्रान्ति आदिके अवसरपर नैमित्तिक तर्पण करते या तिलांजलि देते, तब उसे भी यह पी जाता। आज आपने अपने नखोंसे उसका पेट फाड़कर वह सब-का-सब लौटाकर मानो हमें दे दिया। आप समस्त धर्मोंके एकमात्र रक्षक हैं। नृसिंहदेव! हम आपको नमस्कार करते हैं॥ ४४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—पि तिलाम्बुमिश्रम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 854)

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