॥ श्रीहरिः ॥
सप्तम स्कन्ध
श्रीमद्भागवतमहापुराणम्
सप्तमः स्कन्धः
- 1अथ प्रथमोऽध्यायःनारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजयकी कथा47 श्लोक
पृष्ठ 805 - 2अथ द्वितीयोऽध्यायःहिरण्याक्षका वध होनेपर हिरण्यकशिपुका अपनी माता और कुटुम्बियोंको समझाना61 श्लोक
पृष्ठ 811 - 3अथ तृतीयोऽध्यायःहिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति38 श्लोक
पृष्ठ 818 - 4अथ चतुर्थोऽध्यायःहिरण्यकशिपुके अत्याचार और प्रह्लादके गुणोंका वर्णन46 श्लोक
पृष्ठ 823 - 5अथ पञ्चमोऽध्यायःहिरण्यकशिपुके द्वारा प्रह्लादजीके वधका प्रयत्न57 श्लोक
पृष्ठ 828 - 6अथ षष्ठोऽध्यायःप्रह्लादजीका असुर-बालकोंको उपदेश30 श्लोक
पृष्ठ 836 - 7अथ सप्तमोऽध्यायःप्रह्लादजीद्वारा माताके गर्भमें प्राप्त हुए नारदजीके उपदेशका वर्णन55 श्लोक
पृष्ठ 841 - 8अथाष्टमोऽध्यायःनृसिंहभगवान्का प्रादुर्भाव, हिरण्यकशिपुका वध एवं ब्रह्मादि देवताओंद्वारा भगवान्की स्तुति56 श्लोक
पृष्ठ 847 - 9अथ नवमोऽध्यायःप्रह्लादजीके द्वारा नृसिंहभगवान्की स्तुति55 श्लोक
पृष्ठ 856 - 10अथ दशमोऽध्यायःप्रह्लादजीके राज्याभिषेक और त्रिपुरदहनकी कथा71 श्लोक
पृष्ठ 867 - 11अथैकादशोऽध्यायःमानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्मका निरूपण35 श्लोक
पृष्ठ 875 - 12अथ द्वादशोऽध्यायःब्रह्मचर्य और वानप्रस्थ आश्रमोंके नियम31 श्लोक
पृष्ठ 879 - 13अथ त्रयोदशोऽध्यायःयतिधर्मका निरूपण और अवधूत-प्रह्लाद-संवाद46 श्लोक
पृष्ठ 883 - 14अथ चतुर्दशोऽध्यायःगृहस्थसम्बन्धी सदाचार42 श्लोक
पृष्ठ 888 - 15अथ पञ्चदशोऽध्यायःगृहस्थोंके लिये मोक्षधर्मका वर्णन80 श्लोक
पृष्ठ 893
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥