श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.42

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

इन्द्र उवाच

प्रत्यानीताः परम भवता त्रायता नः स्वभागा

दैत्याक्रान्तं हृदयकमलं त्वद‍्गृहं प्रत्यबोधि।

कालग्रस्तं कियदिदमहो नाथ शुश्रूषतां ते

मुक्तिस्तेषां न हि बहुमता नारसिंहापरैः किम्॥ ४२

pratyānītāḥ parama bhavatā trāyatā naḥ svabhāgā

daityākrāntaṃ hṛdayakamalaṃ tvadgṛhaṃ pratyabodhi|

kālagrastaṃ kiyadidamaho nātha śuśrūṣatāṃ te

muktisteṣāṃ na hi bahumatā nārasiṃhāparaiḥ kim|| 42

अर्थ

इन्द्रने कहा—पुरुषोत्तम! आपने हमारी रक्षा की है। आपने हमारे जो यज्ञभाग लौटाये हैं, वे वास्तवमें आप (अन्तर्यामी)-के ही हैं। दैत्योंके आतंकसे संकुचित हमारे हृदयकमलको आपने प्रफुल्लित कर दिया। वह भी आपका ही निवासस्थान है। यह जो स्वर्गादिका राज्य हमलोगोंको पुनः प्राप्त हुआ है, यह सब कालका ग्रास है। जो आपके सेवक हैं, उनके लिये यह है ही क्या? स्वामिन्! जिन्हें आपकी सेवाकी चाह है, वे मुक्तिका भी आदर नहीं करते। फिर अन्य भोगोंकी तो उन्हें आवश्यकता ही क्या है॥ ४२॥

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