श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.2

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

यथा हि पुरुषस्येह विष्णोः पादोपसर्पणम्।

यदेष सर्वभूतानां प्रिय आत्मेश्‍वरः सुहृत्॥ २

yathā hi puruṣasyeha viṣṇoḥ pādopasarpaṇam|

yadeṣa sarvabhūtānāṃ priya ātmeśvaraḥ suhṛt|| 2

अर्थ

इस मनुष्य-जन्ममें श्रीभगवान्‌के चरणोंकी शरण लेना ही जीवनकी एकमात्र सफलता है। क्योंकि भगवान् समस्त प्राणियोंके स्वामी, सुहृद‍्, प्रियतम और आत्मा हैं॥ २॥✎ 589

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #589 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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