इस मनुष्य-जन्ममें श्रीभगवान्के चरणोंकी शरण लेना ही जीवनकी एकमात्र सफलता है। क्योंकि भगवान् समस्त प्राणियोंके स्वामी, सुहृद्, प्रियतम और आत्मा हैं॥ २॥✎ 589
यथा हि पुरुषस्येह विष्णोः पादोपसर्पणम्।
यदेष सर्वभूतानां प्रिय आत्मेश्वरः सुहृत्॥ २
इस मनुष्य-जन्ममें श्रीभगवान्के चरणोंकी शरण लेना ही जीवनकी एकमात्र सफलता है। क्योंकि भगवान् समस्त प्राणियोंके स्वामी, सुहृद्, प्रियतम और आत्मा हैं॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.6.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 836) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/6/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)