॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.6.3
सुखमैन्द्रियकं दैत्या देहयोगेन देहिनाम्।
सर्वत्र लभ्यते दैवाद्यथा दुःखमयत्नतः॥ ३
sukhamaindriyakaṃ daityā dehayogena dehinām|
sarvatra labhyate daivādyathā duḥkhamayatnataḥ|| 3
अर्थ
भाइयो! इन्द्रियोंसे जो सुख भोगा जाता है, वह तो—जीव चाहे जिस योनिमें रहे—प्रारब्धके अनुसार सर्वत्र वैसे ही मिलता रहता है, जैसे बिना किसी प्रकारका प्रयत्न किये, निवारण करनेपर भी दुःख मिलता है॥ ३॥✎ 589