॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.6.1
अथ षष्ठोऽध्यायः
प्रह्लादजीका असुर-बालकोंको उपदेश
प्रह्राद उवाच
कौमार१ आचरेत्प्राज्ञो धर्मान् भागवतानिह।
दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम्॥ १
kaumāra ācaretprājño dharmān bhāgavatāniha|
durlabhaṃ mānuṣaṃ janma tadapyadhruvamarthadam|| 1
अर्थ
प्रह्लादजीने कहा—मित्रो! इस संसारमें मनुष्य-जन्म बड़ा दुर्लभ है। इसके द्वारा अविनाशी परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। परन्तु पता नहीं कब इसका अन्त हो जाय; इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको बुढ़ापे या जवानीके भरोसे न रहकर बचपनमें ही भगवान्की प्राप्ति करानेवाले साधनोंका अनुष्ठान कर लेना चाहिये॥ १॥✎ 589
टिप्पणियाँ
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प्राचीन प्रतिमें प्रह्लादके वाक्यमें ‘कौमार आचरेत्प्राज्ञो’ इस श्लोकके पहले पाँच श्लोक और अधिक हैं। ये पाँच श्लोक भागवतके विख्यात टीकाकार श्रीविजयध्वजजीने भी माने हैं और उन्होंने उनपर टीका भी लिखी है। प्राचीन प्रतिका लेख कहीं-कहीं अस्पष्ट और खण्डित होनेके कारण ये पाँच श्लोक शुद्ध रूपमें नहीं लिये जा सके, अतः उनको विजयध्वजकी टीकाके अनुसार शुद्ध करके यहाँ उद्धृत किया जा रहा है—
हन्तार्भका मे शृणुत वचो वः सर्वतः शिवम् । वयस्यान् पश्यत मृतान् क्रीडान्धा मा प्रमाद्यथ॥
न पुरा विवशं बाला आत्मनोऽर्थे प्रियैषिणः। गुरूक्तमपि न ग्राह्यं यदनर्थेऽर्थकल्पनम्॥
यदुक्त्या न प्रबुद्ध्येत सुप्तस्त्वज्ञाननिद्रया । न श्रद्दध्यान्मतं तस्य यथान्धो ह्यन्धनायकः॥
कः शत्रुः क उदासीनः किं मित्रं चेह आत्मनः । भवत्स्वपि नयैः किं स्याद्दैवं सम्पद्विपत्पदम्॥
यो न हिंस्याद्धर्मकाममात्मानं स्वजने वशः । पुनः श्रीलोकयोर्हेतुः स मुक्तान्ध्योऽतिदुर्लभः॥