श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.39

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नैर्ऋतास्ते समादिष्टा भर्त्रा वै शूलपाणयः।✎ 1101 1102

तिग्मदंष्ट्रकरालास्यास्ताम्रश्मश्रुशिरोरुहाः॥ ३९

nair:ṛtāste samādiṣṭā bhartrā vai śūlapāṇayaḥ|

tigmadaṃṣṭrakarālāsyāstāmraśmaśruśiroruhāḥ|| 39

अर्थ

जब हिरण्यकशिपुने दैत्योंको इस प्रकार आज्ञा दी, तब तीखी दाढ़, विकराल वदन, लाल-लाल दाढ़ी-मूँछ एवं केशोंवाले दैत्य हाथोंमें त्रिशूल ले-लेकर ‘मारो, काटो’—इस प्रकार बड़े जोरसे चिल्लाने लगे। प्रह्लाद चुपचाप बैठे हुए थे और दैत्य उनके सभी मर्मस्थानोंमें शूलसे घाव कर रहे थे॥ ३९-४०॥

यह अर्थ श्लोक 39–40 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1101 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्तास्ते → नैऋर्ऋतास्ते
  • #1102 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्ऋतास्ते → नैर्ऋतास्ते

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