॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.5.38
सर्वैरुपायैर्हन्तव्यः सम्भोजशयनासनैः।
सुहृल्लिङ्गधरः शत्रुर्मुनेर्दुष्टमिवेन्द्रियम्॥ ३८
sarvairupāyairhantavyaḥ sambhojaśayanāsanaiḥ|
suhṛlliṅgadharaḥ śatrurmunerduṣṭamivendriyam|| 38
अर्थ
यह स्वजनका बाना पहनकर मेरा कोई शत्रु ही आया है। जैसे योगीकी भोगलोलुप इन्द्रियाँ उसका अनिष्ट करती हैं, वैसे ही यह मेरा अहित करनेवाला है। इसलिये खाने, सोने, बैठने आदिके समय किसी भी उपायसे इसे मार डालो’॥ ३८॥