रे नीच ब्राह्मण! यह तेरी कैसी करतूत है; दुर्बुद्धि! तूने मेरी कुछ भी परवा न करके इस बच्चेको कैसी निस्सार शिक्षा दे दी? अवश्य ही तू हमारे शत्रुओंके आश्रित है॥ २६॥✎ 5881958
ब्रह्मबन्धो किमेतत्ते विपक्षं श्रयतासता।
असारं ग्राहितो बालो मामनादृत्य दुर्मते॥ २६
रे नीच ब्राह्मण! यह तेरी कैसी करतूत है; दुर्बुद्धि! तूने मेरी कुछ भी परवा न करके इस बच्चेको कैसी निस्सार शिक्षा दे दी? अवश्य ही तू हमारे शत्रुओंके आश्रित है॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 831) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/5/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#588 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्की
#1958 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परवाह → परवा