श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.27

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

सन्ति ह्यसाधवो लोके दुर्मैत्राश्छद्मवेषिणः।

तेषामुदेत्यघं काले रोगः पातकिनामिव॥ २७

santi hyasādhavo loke durmaitrāśchadmaveṣiṇaḥ|

teṣāmudetyaghaṃ kāle rogaḥ pātakināmiva|| 27

अर्थ

संसारमें ऐसे दुष्टोंकी कमी नहीं है, जो मित्रका बाना धारणकर छिपे-छिपे शत्रुका काम करते हैं। परन्तु उनकी कलई ठीक वैसे ही खुल जाती है, जैसे छिपकर पाप करनेवालोंका पाप समयपर रोगके रूपमें प्रकट होकर उनकी पोल खोल देता है॥ २७॥✎ 588 1958

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #588 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्‌की
  • #1958 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परवाह → परवा

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