श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.25

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

निशम्यैतत्सुतवचो हिरण्यकशिपुस्तदा।

गुरुपुत्रमुवाचेदं रुषा प्रस्फुरिताधरः॥ २५

niśamyaitatsutavaco hiraṇyakaśipustadā|

guruputramuvācedaṃ ruṣā prasphuritādharaḥ|| 25

अर्थ

प्रह्लादकी यह बात सुनते ही क्रोधके मारे हिरण्यकशिपुके ओठ फड़कने लगे। उसने गुरुपुत्रसे कहा—॥ २५॥✎ 588 1958

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #588 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्‌की
  • #1958 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परवाह → परवा

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