श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.24

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्‍नवलक्षणा।

क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥ २४

iti puṃsārpitā viṣṇau bhaktiścennavalakṣaṇā|

kriyate bhagavatyaddhā tanmanye'dhītamuttamam|| 24

अर्थ

प्रह्लादजीने कहा—पिताजी! विष्णुभगवान्‌की भक्तिके नौ भेद हैं—भगवान्‌के गुण-लीला-नाम आदिका श्रवण, उन्हींका कीर्तन, उनके रूप-नाम आदिका स्मरण, उनके चरणोंकी सेवा, पूजा-अर्चा, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। यदि भगवान्‌के प्रति समर्पणके भावसे यह नौ प्रकारकी भक्ति की जाय, तो मैं उसीको उत्तम अध्ययन समझता हूँ॥ २३-२४॥✎ 588 1958

यह अर्थ श्लोक 23–24 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #588 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्‌की
  • #1958 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परवाह → परवा

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