martyasya te amartyasya darśanaṃ nāphalaṃ mama|| 21
अर्थ
दैत्यशिरोमणे! इसीसे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें जो कुछ माँगो, दिये देता हूँ। तुम हो मरनेवाले और मैं हूँ अमर! अतः तुम्हें मेरा यह दर्शन निष्फल नहीं हो सकता॥ २१॥
ततस्त आशिषः सर्वा ददाम्यसुरपुङ्गव।
मर्त्यस्य ते अमर्त्यस्य दर्शनं नाफलं मम॥ २१
दैत्यशिरोमणे! इसीसे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें जो कुछ माँगो, दिये देता हूँ। तुम हो मरनेवाले और मैं हूँ अमर! अतः तुम्हें मेरा यह दर्शन निष्फल नहीं हो सकता॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.3.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 820) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/3/21/