श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.15

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

न ददर्श प्रतिच्छन्‍नं वल्मीकतृणकीचकैः।

पिपीलिकाभिराचीर्णमेदस्त्वङ्मांसशोणितम् ॥ १५

na dadarśa praticchannaṃ valmīkatṛṇakīcakaiḥ|

pipīlikābhirācīrṇamedastvaṅmāṃsaśoṇitam || 15

अर्थ

वहाँ जानेपर पहले तो वे उसे देख ही न सके; क्योंकि दीमककी मिट्टी, घास और बाँसोंसे उसका शरीर ढक गया था। चींटियाँ उसकी मेदा, त्वचा, मांस और खून चाट गयी थीं॥ १५॥

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