श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.16

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तपन्तं तपसा लोकान् यथाभ्रापिहितं रविम्।

विलक्ष्य विस्मितः प्राह प्रहसन् हंसवाहनः॥ १६

tapantaṃ tapasā lokān yathābhrāpihitaṃ ravim|

vilakṣya vismitaḥ prāha prahasan haṃsavāhanaḥ|| 16

अर्थ

बादलोंसे ढके हुए सूर्यके समान वह अपनी तपस्याके तेजसे लोकोंको तपा रहा था। उसको देखकर ब्रह्माजी भी विस्मित हो गये। उन्होंने हँसते हुए कहा॥ १६॥

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