श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.5

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

विप्रचित्ते मम वचः पुलोमन् शकुनादयः।

शृणुतानन्तरं सर्वे क्रियतामाशु मा चिरम्॥ ५

vipracitte mama vacaḥ puloman śakunādayaḥ|

śṛṇutānantaraṃ sarve kriyatāmāśu mā ciram|| 5

अर्थ

उस समय विकराल दाढ़ों, आग उगलनेवाली उग्र दृष्टि और चढ़ी हुई भौंहोंके कारण उसका मुँह देखा न जाता था। भरी सभामें त्रिशूल उठाकर उसने द्विमूर्धा, त्र्यक्ष, शम्बर, शतबाहु, हयग्रीव, नमुचि, पाक, इल्वल, विप्रचित्ति, पुलोमा और शकुन आदिको सम्बोधन करके कहा—‘दैत्यो और दानवो! तुम सब लोग मेरी बात सुनो और उसके बाद जैसे मैं कहता हूँ, वैसे करो॥ ३—५॥✎ 580

यह अर्थ श्लोक 3–5 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #580 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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