॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.2.4
भो भो दानवदैतेया द्विमूर्धंस्त्र्यक्ष शम्बर।
शतबाहो हयग्रीव नमुचे पाक इल्वल॥ ४
bho bho dānavadaiteyā dvimūrdhaṃstryakṣa śambara|
śatabāho hayagrīva namuce pāka ilvala|| 4
अर्थ
उस समय विकराल दाढ़ों, आग उगलनेवाली उग्र दृष्टि और चढ़ी हुई भौंहोंके कारण उसका मुँह देखा न जाता था। भरी सभामें त्रिशूल उठाकर उसने द्विमूर्धा, त्र्यक्ष, शम्बर, शतबाहु, हयग्रीव, नमुचि, पाक, इल्वल, विप्रचित्ति, पुलोमा और शकुन आदिको सम्बोधन करके कहा—‘दैत्यो और दानवो! तुम सब लोग मेरी बात सुनो और उसके बाद जैसे मैं कहता हूँ, वैसे करो॥ ३—५॥✎ 580