श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.38

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अहो वयं धन्यतमा यदत्र

त्यक्ताः पितृभ्यां न विचिन्तयामः।

अभक्ष्यमाणा अबला वृकादिभिः

स रक्षिता रक्षति यो हि गर्भे॥ ३८✎ 1098

aho vayaṃ dhanyatamā yadatra

tyaktāḥ pitṛbhyāṃ na vicintayāmaḥ|

abhakṣyamāṇā abalā vṛkādibhiḥ

sa rakṣitā rakṣati yo hi garbhe|| 38

अर्थ

हम तो तुमसे लाखगुने अच्छे हैं, परम धन्य हैं; क्योंकि हमारे माँ-बापने हमें छोड़ दिया है। हमारे शरीरमें पर्याप्त बल भी नहीं है, फिर भी हमें कोई चिन्ता नहीं है। भेड़िये आदि हिंसक जन्तु हमारा बाल भी बाँका नहीं कर पाते। जिसने गर्भमें रक्षा की थी, वही इस जीवनमें भी हमारी रक्षा करता रहता है॥ ३८॥✎ 2019

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1098 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ३ → ३८
  • #2019 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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