॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.15.48
हिंस्रं द्रव्यमयं काम्यमग्निहोत्राद्यशान्तिदम्।
दर्शश्च पूर्णमासश्च चातुर्मास्यं पशुः३ सुतः॥ ४८
hiṃsraṃ dravyamayaṃ kāmyamagnihotrādyaśāntidam|
darśaśca pūrṇamāsaśca cāturmāsyaṃ paśuḥ sutaḥ|| 48
अर्थ
श्येनयागादि हिंसामय कर्म, अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुयाग, सोमयाग, वैश्वदेव, बलिहरण आदि द्रव्यमय कर्म ‘इष्ट’ कहलाते हैं और देवालय, बगीचा, कुआँ आदि बनवाना तथा प्याऊ आदि लगाना ‘पूर्त्तकर्म’ हैं। ये सभी प्रवृत्तिपरक कर्म हैं और सकामभावसे युक्त होनेपर अशान्तिके ही कारण बनते हैं॥ ४८-४९॥✎ 1618 1619
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—पशुस्ततः।